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11:55 am June 19, 2024

संस्कारों और सोच का फर्क…?

कल सभी चैनलों में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वाराणसी में अपना नामांकन दाखिल करने के समय पंजाब के बुजुर्ग अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल के पैर छूते हुए देखा, तो देश नहीं सारी दुनिया में इसकी चर्चा हुई।

वह एक छोटी पार्टी के नेता हैं मुख्यमंत्री भी नहीं।

और दूसरी तरफ एक दमदार प्रधानमंत्री 69 वर्ष के जो सारी दुनिया में इस समय पर चर्चा का विषय बने हुए हैं वह अपने संस्कारों के कारण से नामांकन भरने के समय पैर छूता है।

और दूसरी तरफ अपनी मां से ही जब अध्यक्ष पद लिया तो उस समय पर मां को भी माथे पर चूम कर राहुल गांधी बता रहे हैं, कि उनके संस्कार इस धरती के नहीं, इटली के ही हैं। हम भारतीय तो ऐसा नहीं करते।

ऐसे ही जब राहुल गांधी नामांकन भरने गए तो केवल परिवार के ही 4 सदस्य, सोनिया गांधी, प्रियंका और राबर्ट वाड्रा। यानी परिवार ही पार्टी है।

दूसरी तरफ मोदी जी के नामांकन भरते वक्त एनडीए की सभी पार्टियों के मुखिया मौजूद थे, जो बता रहे थे इनके लिए पार्टी और सहयोगी दल ही परिवार हैं।

एक पुराना प्रसंग:2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री बने थे तो पहली लोकसभा सदस्यों की बैठक में आडवाणी जी ने कह दिया कि नरेंद्र भाई ने बड़ी कृपा की है कि पार्टी को बहुमत दिलाया।

तो सबको याद होगा मोदी जी ने रोते हुए कहा था की “पार्टी भी मेरी मां है, और मां की सेवा करने के लिए कोई धन्यवाद नहीं करता।”

और अधिकांश सांसद रो पड़े थे।

और दूसरी तरफ राहुल को पार्टी का अध्यक्ष पद केवल इसीलिए मिला कि वह राजीव और सोनिया गांधी का लड़का है। उनके लिए पार्टी एक खानदानी संपत्ति है।

यही है वंशवादी राजनीति या वैचारिक राजनीति का फर्क।

~#सतीशकुमार

Author: swadeshijoin

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