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1:49 pm June 19, 2024

सकारात्मकता,स्वस्थ संबंध व दृढ़ इच्छाशक्ति ही है,सुखी जीवन की राह!

परसों मैं जब इंदौर से चलने लगा तो अपने मनोज द्विवेदी जी के घर पर उनके पिता-माताजी से मिलने का सौभाग्य मिला।मैंने सहज रूप से पिताजी से पूछा “स्वास्थ्य कैसा है?”

वे बुजुर्ग हैं।82 साल के हैं।वे बोले “बहुत अच्छा है।एकदम सुखी-प्रसन्न हूं।बस थोड़ा सा प्रोस्टेट कैंसर है कीमो ले रहा हूं। शायद ठीक हो जाएगा।बाकी सब बढ़िया है।”

मैं चौका “कैंसर…क्या कह रहे हैं,आप?”

और मनोज जी की तरफ देखा उन्होंने हामी भरी।

फिर मैंने पूछा “आप इतने स्वस्थ और सुखी कैसे दिख रहे हैं?” वे बोले “स्वस्थ तो नहीं हूं उतना, पर सुखी अवश्य हूं।एक तो मेरे बेटे और बहू बहुत अच्छे हैं,मेरा कहना मानते हैं।कभी ये नहीं मानते,तो मैं मान जाता हूं।बाकि पोते-पोती मुझे बड़े प्यारे हैं।”

मेरी उत्सुकता बढ़ी,तो मैंने विस्तार से बताने को कहा।तो उन्होंने कहा “मैं घूम फिर लेता हूं इस उम्र में भी, क्या कम है? बच्चों को ज्यादा टोकता नहीं। मैं दुखी होकर समय काटूं या सूखी होकर,यह मेरे हाथ में है।तो मैं सोचता हूं सुखी होकर ही सब कुछ चलाना चाहिए,क्यों ठीक है ना?”

मैंने उन्हें प्रणाम किया और विदा ली।

बाद में मुझे मनोज जी ने कहा कि पिताजी एक बार कीमो के लिए स्वयं चले गए।अभी 2 वर्ष पहले तक स्कूटी भी स्वयं चला लेते थे।वह बड़ी दृढ़ इच्छाशक्ति वाले हैं,मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं।”

तभी मुझे याद आया स्टीफन हॉकिंस अमेरिकी वैज्ञानिक, जिसने ब्लैक होल की खोज की,उसका कोई भी शारीरिक अंग ठीक नहीं था।बोलना बंद था।सुनना संभव नहीं था।मशीनों के जरिए जीवन था।किंतु वह देश और दुनिया को अपनी सकारात्मकता और दृढ़ इच्छाशक्ति के आधार पर कितना कुछ योगदान कर गया।

तो सुखी और सफल होने के लिए यह बिल्कुल आवश्यक नहीं कि कितना पैसा,पद और शोहरत आपके पास है।यहां तक कि शरीर भी कुछ अस्वस्थ हुआ तो भी चलेगा,पर सकारात्मकता,स्वस्थ संबंध व दृढ़ इच्छाशक्ति के बिना नहीं।क्यों ठीक कहा?

नीचे:इंदौर में मनोज जी के माता पिता जी के साथ व त्रिवेंद्रम में कश्मीरी लाल जी एक गोष्ठी में,जिसकी अध्यक्षता पूर्व राज्यपाल चंद्रशेखरन जी ने की।

~#सतीशकुमार

सकारात्मकता,स्वस्थ संबंध व

दृढ़ इच्छाशक्ति ही है,सुखी जीवन की राह!

परसों मैं जब इंदौर से चलने लगा तो अपने मनोज द्विवेदी जी के घर पर उनके पिता-माताजी से मिलने का सौभाग्य मिला।मैंने सहज रूप से पिताजी से पूछा “स्वास्थ्य कैसा है?”

वे बुजुर्ग हैं।82 साल के हैं।वे बोले “बहुत अच्छा है।एकदम सुखी-प्रसन्न हूं।बस थोड़ा सा प्रोस्टेट कैंसर है कीमो ले रहा हूं। शायद ठीक हो जाएगा।बाकी सब बढ़िया है।”

मैं चौका “कैंसर…क्या कह रहे हैं,आप?”

और मनोज जी की तरफ देखा उन्होंने हामी भरी।

फिर मैंने पूछा “आप इतने स्वस्थ और सुखी कैसे दिख रहे हैं?” वे बोले “स्वस्थ तो नहीं हूं उतना, पर सुखी अवश्य हूं।एक तो मेरे बेटे और बहू बहुत अच्छे हैं,मेरा कहना मानते हैं।कभी ये नहीं मानते,तो मैं मान जाता हूं।बाकि पोते-पोती मुझे बड़े प्यारे हैं।”

मेरी उत्सुकता बढ़ी,तो मैंने विस्तार से बताने को कहा।तो उन्होंने कहा “मैं घूम फिर लेता हूं इस उम्र में भी, क्या कम है? बच्चों को ज्यादा टोकता नहीं। मैं दुखी होकर समय काटूं या सूखी होकर,यह मेरे हाथ में है।तो मैं सोचता हूं सुखी होकर ही सब कुछ चलाना चाहिए,क्यों ठीक है ना?”

मैंने उन्हें प्रणाम किया और विदा ली।

बाद में मुझे मनोज जी ने कहा कि पिताजी एक बार कीमो के लिए स्वयं चले गए।अभी 2 वर्ष पहले तक स्कूटी भी स्वयं चला लेते थे।वह बड़ी दृढ़ इच्छाशक्ति वाले हैं,मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं।”

तभी मुझे याद आया स्टीफन हॉकिंस अमेरिकी वैज्ञानिक, जिसने ब्लैक होल की खोज की,उसका कोई भी शारीरिक अंग ठीक नहीं था।बोलना बंद था।सुनना संभव नहीं था।मशीनों के जरिए जीवन था।किंतु वह देश और दुनिया को अपनी सकारात्मकता और दृढ़ इच्छाशक्ति के आधार पर कितना कुछ योगदान कर गया।

तो सुखी और सफल होने के लिए यह बिल्कुल आवश्यक नहीं कि कितना पैसा,पद और शोहरत आपके पास है।यहां तक कि शरीर भी कुछ अस्वस्थ हुआ तो भी चलेगा,पर सकारात्मकता,स्वस्थ संबंध व दृढ़ इच्छाशक्ति के बिना नहीं।क्यों ठीक कहा?

नीचे:इंदौर में मनोज जी के माता पिता जी के साथ व त्रिवेंद्रम में कश्मीरी लाल जी एक गोष्ठी में,जिसकी अध्यक्षता पूर्व राज्यपाल चंद्रशेखरन जी ने की।

~#सतीशकुमार

Author: swadeshijoin

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